आज मेरी नज़्मों को तुम न देखो तो न सही आज जो तुम न समझो मेरे लेखो को तो न सही पर उस दिन मेरे नज़्मों को सुनने तुम जरूर आना पर उस दिन एक ताना बुनने तुम जरूर आना जिस दिन न तेरी न मेरी शोहरतो के ताज़ होंगे जिस दिन न तेरे न मेरे दौलतो के बाग होंगे जिस दिन तुझसे मुझसे कई बेहतर इस बाज़ार में खड़े होंगे जिस दिन तुम और मैं अपनी नज़्मों की तरह किसी कोने में पड़े होंगे जब जवानी पे दोनों के शर्राफ पड़ ज़ायेंगे जब दोनों बस एक दूजे के साथ ही खड़े रह ज़ायेंगे तब हमें एक दूसरे की ही नज़्मों का सहारा होगा न मसरूफ रखेगी ज़िन्दगी हमें, और सारा वक़्त हमारा होगा हाँ हो सकता है हम में से कोई एकपहले ही चला जाए हां हो सकता है फातिहा किसी हम में से पहले पढ़ा जाए पर जो रह जाएगा आओ आज ये वादा करेगा महफ़िलो में वो बड़ी शिद्दत से वो दुसरे की भी नज़्म पढ़ेगा लेकिन हो सकता है तब तुझसे मुझसे कई बेहतर इस बाज़ार में खड़े होंगे हो सकता है तुम और मैं अपनी नज़्मों की तरह किसी कोने में फिर पड़े होंगे आशीष 'प्रकाश '