हो गए कई रोज़ उलझे अब तो एक तकरार हो
कम से कम दिल से उनके ख़त्म कोई ग़ुबार हो
गूँजते थे शोर में तो लफ़्ज़ बस इंकार के
जो थमे एक पल भी ख़ामोशी तो फिर इकरार हो
चाहे जो मतलब निकाले दुनिया मेरी नज़्म का
आख़िरी कोशिश रहेगी, असर उधर एक बार हो
यादो गाली या गिला दो या लगा लो तुम गले
बैठ लो बस पास एक पल, पल भले ही उधार हो
आ गया फ़ितूर हमपे सरफ़रोशी का जो अब
देखेंगे कि कब तलक ना तुझपे भी ये सवार हो
लड़ लिए हम ख़ूब कर के ज़ाया पूरा बचपना
हो गए अब हम जवाँ के दरमियाँ कुछ प्यार हो
हो गए कई रोज़ उलझे अब तो एक तकरार हो
कम से कम दिल से उनके ख़त्म कोई ग़ुबार हो