रात बोझल सी क्यूँ बैठी? दिन ही है आ जाएगा एक किरण बस भोर की और फिर प्रकाश छा जाएगा आग है मसान की ये, जल्द ही बुझ जाएगी ज्योत नवजीवन की फिर से क्षितिज में घुल जाएगी हिम्मतों की आग देंगे, हवनकुंड जलाएँगे श्रम शक्ति की दे समिधा, यज्ञ करते जाएँगे विघ्न युग हर एक ही आतें हैं महा प्रयास में पर जो रौंधे मुश्किलें, है आग उसिकी प्यास में दे न विश्व जो साथ तेरा, तू विश्व नवीन बनाएगा एक किरण बस भोर की और फिर प्रकाश छा जाएगा ले रहा तू क्यूँ समाधि, ये समय जो पलट गया कब सुना की वीर अभिमन्यु ही रण से हट गया विश्व को दे संदेश नया कुछ, प्राण नव संचार कर क्या है जो है भिन्न तुझमें हो सके तो विचार कर खण्डहर हो के जो रक्खे प्रण हैं तेरी आस में इसलिए ही रात काली फैली है आकाश में मन से शंका दो मिटा और शस्त्र का संधान कर क्षीण से बैठे जो साथी उनमें भी तू प्राण भर युग नए का नव सवेरा तू ही अब ला पाएगा एक किरण बस भोर की और फिर प्रकाश छा जाएगा