आज धधकती आग में जल रहा है ये शहर सुनो सुना रहा हूँ तुमको जो वो दास्तान -ए- कहर सुनो जब चौक चांदनी चौराहो पर लगते थे ईदी के मेले जब चोटी और टोपी वाले बच्चे गलियों में थे संग खेले जब शीशगंज और जामा मज़्जिद में फर्क न कोई करता था जब मंदिरो के सम्मेलनों में ग़ालिब को एक पंडित पढता था जब शाम की आरती का वक़्त कोई नमाज़ी याद दिलाता था और मज़्जिदो में अज़ान का माइक एक हिन्दू ठीक कराता था फिर एक दिन कुछ बाज़ो ने आके सब कुछ यूँ बर्बाद किया तोड़े कच्चे धागे दिल के, रिश्तो को ज़ार ज़ार किया घुल गया जो खून में अपने, मज़हबी ये ज़हर सुनो सुना रहा हूँ तुमको जो वो दास्तान -ए- कहर सुनो #सियासतों के बाज़ो ने भी अपनी पैनी नज़र जमाई थी एक एक इंसान के आँखें सबने नोच नोच के खाई थी हो गए फिर ऐसे अंधे की अपनों को भी न पहचाना तोड़ दिया खुद हाथ से अपने सदियों का वो ताना बाना जो बच गए कुछ आँख वाले तो उनको बाज़ो ने धमकाया अन्धो की बस्ती में फिर होता फ़रेब कभी कोई देख न पाया फिर कभी इस काली रात का जो न बीता वो काला पहर सुनो सुना रहा हूँ तुमको जो वो दास्तान -ए- कहर सुनो #महफ़िलो में भी लोग अलग और तनहा आदमी दिखता है साहित्य में भी बट गए लोग अब ये फर्क लाज़मी दिखता है देखो आज कोई भी कवी न उर्दू शायरी पढता है और न कोई उर्दू शायर कवी गोष्ठियों में चढ़ता है दौड़ती जा रही थी जो ज़िन्दगी, कब गयी वो ठहर सुनो सुना रहा हूँ तुमको जो वो दास्तान -ए- कहर सुनो ये फर्क था ? या हमने इसे खुद जाया है ये माज़ी नहीं, ये हमारे काले मुस्तकबिल का साया है सोचो क्या इमारतों की बुनियाद कभी भी इतनी कच्ची थी या फिर बाज़ो की दिखाई तस्वीर ही दिखी तुम्हे सच्ची थी क्यों सोच मैं आज परेशां रहु जो फर्क ये इतना गहरा है सदियों से हिन्दुस्तान आज भी सन सैतालिस पे ठहरा है हाँ वो कल घिनौना था, उस कल की यादें भी काली हैं किसी एक की कहाँ दोस्त, ये दरारे वक़्त ने सबकी किस्मत में डाली हैं किसी एक की कहाँ दोस्त, ये दरारे वक़्त ने सबकी किस्मत में डाली हैं - आशीष सक्सेना प्रकाश https://terapratibimbh.blogspot.in/