मौत को भी आज़मा के देख लूँगा
रकाबते मैं अब जहाँ के देख लूँगा
एक मेरी हसरतें और एक दुनिया
दोनो को मैं अब मिला के देख लूँगा
हो गयी है दफ़्न हर उम्मीद दिल में
दिल पे भी चादर चढ़ा के देख लूँगा
ज़िंदगी में हार के हर चीज़ अपनी
ख़ुद की भी बाज़ी लगा के देख लूँगा
आख़िरी ख़्वाहिश मेरी जो हो नुमाया
मैं भी खुल के मुस्कुरा के देख लूँगा
क़ैद कर के ख़ुद को अब मैं बंदिशो में
तुझमें कितना है खुदाया देख लूँगा
तेरी ज़ानो में झुका के सर को अपने
अपने हिस्से का मसीहा देख लूँगा
प्रकाश ‘आशीष’