कब से सज्जा कर रहा देह नित नित मर रहा माँस का ये देह है व्यर्थ सारे नेह हैं नैन दृष्टि खोएँगे नीर भर के रोएँगे वृक्ष की छाया नहीं सब ही है माया यहीं पत्ता पत्ता वृक्ष का नित प्रतिदिन झड़ रहा कब से सज्जा कर रहा देह नित नित मर रहा