मन में है  ये द्वन्द क्यों स्वप्न छंद छंद क्यों   जो विक्षिप्त आस है वो ही असली प्यास है   नित नए प्रयास कर स्वयं पर विश्वास कर   दूरी पे गंतव्य है चलना भी कर्त्तव्य है   हो गति धीमी भले सिंह भाँति तू चले   निशान तेरे पग के जो हौसलें वे जग के हों   द्वार सारे बंद क्यों मन में है  ये द्वन्द क्यों