बन हक़ीक़त सामने जो अब फ़साने आ गए एक ज़माने बाद वापस वो ज़माने आ गए उम्र मेरी हो चली थी झूट कहने की मगर देख कर उनको हमें भी कुछ बहाने आ गए मुझ अकेले को कहाँ अब फ़र्क़ था किसी बात का पर दबे ज़ख़्मों को मेरे फिर जलाने आ गए इस जलन को देख के मेरी है करते रश्क वो और कहते है की वो मरहम लगाने आ गए गाँव से शहरों का रस्ता कब कहाँ आसान था शौक़ उनके पूरे करने बस कमाने आ गए