वाह री जनता वाह री जनता तेरे भी खेल निराले हैं तुम कहाँ मासूम, तेरे हाथो में तो लाठी भाले हैं जिस बलात्कार पर तुम कभी नाइंसाफी पे कैंडल ले के घूमे थे उसी बलात्कार की सजा पाए कोई तो तूने शहर , गाँव फूँक डाले हैं वाह री जनता वाह री जनता तेरे भी खेल निराले हैं क्या कहूं की कुछ कहने में भी अबतो डर सा लगता है सुनता हु नहीं रहे वो खिलाफ जिन्होंने तुम्हारे बोल कभी निकाले हैं वाह री जनता वाह री जनता तेरे भी खेल निराले हैं