फिर युद्धों की बात करूँ सम्भव है फिर  उत्पात करूँ   बस मैं प्रत्यक्ष नहीं रहता पावन जल सा भी नहीं बहता   मैं बातों में इतिहास सा हूँ और जन जन में उपहास सा हूँ   उस बंद पड़े भारत में हूँ आंदोलन की आदत में हूँ   मुझे सभ्य समाज का बोध कहाँ रोके जो मुझे अवरोध कहाँ   हक़ को जताना जानता हूँ ‘मैं’सर्वप्रथम, ये मानता हूँ   मैं राजनीति  का दर्पण हूँ मैं जातीवाद आरक्षण हूँ   पर रहा जटिल परिस्थितियों में मैं था ही नहीं स्मृतियों में   मैं बस्ती में पल बढ़ता हूँ कभी सड़क किनारे पढ़ता हूँ   कभी बेच बेच अपना बचपन अपने कल को भी गढ़ता हूँ   मुझमें करण दानी भी हुआ संविधान ज्ञानी भी हुआ   पर अवसर का आभाव रहा हृदय निरंतर घाव रहा   अब बोली क्यूँ चुभती है जब आवाज़ें उठती हैं   हाँ नहीं मैं उग्र आन्दोलन में और नहीं मैं समाज के मर्दन में   आर्थिक प्रश्नों पर उत्तर हों प्रयास यही निरंतर हों   क्यूँ आँख में चुबता कनकण हूँ मैं जातीवाद आरक्षण हूँ