आज फिर तुम ख्वाब में आयी थी
वही मासूम अदाएं वही खामोश सा चेहरा
कुछ गुम सुम थी तब भी, शायद आज की ही तरह तुम्हे तब भी आने वाले कल की शिकंज होगी
पर उस ख्वाब में, तुम दुनिया से ज्यादा मेरी थी
पर हर ख्वाब की ताबीर हो ये मुनासिब तो नहीं
आँख खुलते ही तुम हर सुबह की तरह आज भी दुनिया की तमाम रंजिशों सेअकेले निपटने तैयार हो रही थी
बेटे का स्कूल और अपने दफ्तर के बीच, मेरा ख्वाब कहीं खो रहा था
इसलिए फिर से आँखें मूँद के मैं उस ख्वाब में जाना चाहता हूँ
वो ख्वाब जिसमे, तुम दुनिया से ज्यादा मेरी थी..