इस काव्य में मैंने ऑक्सीजन की कमी से मरते बच्चो, डूबते गाँवों में १५ अगस्त को लहराते तिरंगे, प्रधानमंत्री जी के रोते हुए भाषण देने की वेदना को व्यक्त किया है .. आशा है आप पसंद करेंगे .. #मरते बच्चो को देख के भी आज न ये शर्मिंदा हैं हूँ अचंभित मुझमे देखो आज भी आदमी ज़िंदा हैं सालो से मैंने गाँव को बारिशो में बहते देखा हैं उजड़ी बस्ती और कस्बो को टीन में रहते देखा हैं सूखे में भी न जाने कैसे घरो में राशन आता हैं चीरता हैं जो हृदय धरा का , वो भूखा ही सो जाता हैं ये कम था जो आज भी ट्रेने पटरी से गिर गिर जाती हैं सुन्न हो जाता हैं अंतर्मन और चेतना सो फिर जाती हैं डूबे गाँव में गर फिर लहरा रहा तिरंगा हैं हूँ अचंभित मुझमे देखो आज भी आदमी ज़िंदा हैं # टूटते पुलों को देखता हूँ और डूबी बस्ती देखीं है शिक्षा महँगी देखता हूँ और कारें सस्ती देखीं है गाय के नामो पर तुम मारो, दो जिहाद पे कुर्बानी छलनी कर दो सीना सबका, काली कर दो पेशानी भूखा सोये गरीब और टमाटर गोदामो में सड़ते हैं ये सब जब न बंद हुआ तो युगपुरुष भी रो रो पड़ते हैं अपने वादों को हरगिज़ मैं आंसुओ से न धोता होता उस जगह अगर तो, मैं कदाचित न रोता टूटा बिखरा, नीर बहाता देश का हर बाशिंदा हैं हूँ अचंभित मुझमे देखो आज भी आदमी ज़िंदा हैं #मृत पड़ा हैं मानव अब तो मृत पड़ी ये माटी हैं पीड़ित हैं सम्मान तुम्हारा छलनी अपनी छाती हैं छोटे शहरो में कहाँ अब तो दिल्ली भी रो पड़ती है ये भारत का दिल है यहाँ हर रोज़ निर्भया मरती है इन हालातो में भी मैं खुशबाद ये जीवन जीता हूँ नोटबंदी या हो gst , सब तरह के विष मैं पीता हूँ बारिश में भी जो उड़ता जाता वो बेबाक परिंदा है हूँ अचंभित मुझमे देखो आज भी आदमी ज़िंदा हैं -आशीष प्रकाश https://terapratibimbh.blogspot.in/