मैं कुछ समय से नाथू राम गोडसे के ऊपर काफी लेख पढ़ रहा हूँ न मुझे नाथू राम गोडसे से कोई परेशानी है न ही उनपर लिखी कविताओं से, पर इस देश में बाटने का दौर सा चल रहा है, जिसे हमें समझना होगा तारीख में बंधे थे, हमने जमीने बांटी कुछ लोग भी थे बिछड़े, जब माँ-ए- जमीन काटी थी चुप जो तब सियासत, चली वो तेज़ आंधी अब बहस हो रही क्यों, नाथू बड़ा या गांधी कुछ थे उधर भी अपने कुछ इधर भी थे पराये हलकी सी रौशनी में बड़े गहरे थे वो साये कुछ ऐसी ही है कोशिश मेरे इस आशियाँ में खुश है वो आग दे के, हमारे दर्मियाँ में इस दौर-ए-जम्मूरियत में, सच से है कैसा डरना छुपते हैं जो हैं झूठे, सच्चो को तो अब है लड़ना आशीष 'प्रकाश' https://terapratibimbh.blogspot.in/2017/09/blog-post_28.html