पृथ्वी का श्रंगार हुआ है

पृथ्वी का ,श्रंगार हुआ है,

देखो पुनः ,एक बार हुआ है,

पवन वेग से, बनता बवन्डर

जल बूंदों से ,मिलाप हुआ है

लगी आंगन में, नीम जो मेरे

वो पवन श्पर्श से, लहरा रही है

देखो उस पर ,बैठी कोयल

कुहकुह का स्वर, लगा रही है

वृक्ष की ,शाखाओ को देखो

पत्तियों का जन्म ,पुनः एक बार हुआ है

पृथ्वी का ,श्रंगार हुआ है

देखो ,नाच रहे है वे सब

जल बूंदों से, हो वो लतपत

उसी नीम के ,पेड पर देखो

गौरया का ,नया घराना

और बचपन की यादो के,

झूले उस पर लटके है

देखो इस मौसम से उसका,

पुनः जन्म एक बार हुआ है

पृथ्वी का ,श्रंगार हुआ है


©आशीष कुमार पाण्डेय