हसी वो चाँद

हसी वो चाँद भी देखे ,कोई मुझसा भी रहता है।

सितारों सी चमके आंखे ,स्वरूप मुझसा ही दिखता है।।

होट है पंखुड़ी जैस, लाली अतभुत भाई है।

आकर्षण नेत्र है उसके ,काजल ने शोभा बढाई है।।

उसे देख कोई भी उसका प्रेमी बन जाता है

हसी वो चाँद भी देखे ,कोई मुझसा भी रहता है।  

कानो में छुमके है ऐसे ,सितारों सी सजावट है।

हँसी तो सोम का प्याला ,इशारे कातिलाना है।।

बड़ी सिध्द्त से बनाया सजावट खानदानी है ।

सुन्दरता है उसकी ऐसे ,चाँद भी देख जलता है।। 

हसी वो चाँद भी देखे ,कोई मुझसा भी रहता है ।

© आशीष कुमार पाण्डेय,