आज लिखने चला हूं, मेरे गांव की एक कहानी
कहानी उस शक्स की, नशे में दौड़ती जिसकी जवानी
जिसको अब ना अपनी खबर और ना अपनों का ख्याल है
जिसकी बेरुखी जिंदगी में अब ना कोई आत्मीयता ना कोई मलाल है
हां वही, जिसने ममता को भी ना बख्शा, शराब के चक्कर में
सुना है, नशे में डूबे, उसके, उसी जैसे दोस्त कहते हैं, कोई नहीं तेरी टक्कर में
कभी, बहुत पहले, जब महज वो तुतलाता था, अजीबोग़रीब बातों को बार बार दोहराता था
तब वो मां का अचल प्रेम ही तो था, कि जो वो चाहता वो पाता था
कहानियां सुनाई गईं, चंदा दिखाए गए और इसी बहाने खिला दिए जाते कुछ निवाले
उसको कभी खरोंच आने ना दी, अपने पैरों के जिनके गए ना कभी छाले
मां, वो मोहब्बत होती है जो सब निभा जाती है, चुपचाप बिना अहसास कराए
आज वो भी दिखा रहे हैं उसे आंखें, जो जीवन भर डकारे हों उसका हिस्सा खाए
लोग दोष परवरिश को देते हैं, मगर फिर ये बताओ एक ही घर विभीषण और रावण कैसे हुए
अजी, असर सब संगत का है, सत संग का है, इसीलिए तो कहीं देवता तो कहीं दानव हुए
ये व्यथा थी ममता की, और नशे और क्रूरता के जाल में लिपटे उस लाल की
लड़ाई अगर इंसानी होती तो कब का जीत जाते, मगर ये तो चाल है मन रूपी काल की
