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मजदूर

हम नाजुक से, और पत्थर से, वो मजदूर

वक़्त की पहेलियों में, निवालों को गिनते, वो मजदूर

मजबूरियों में गुनगुनाते, गम को पसीने से धोते, वो मजदूर

जुमलों की मंडी में हर बार ठगे जाने वाले, वो मजदूर

मैले, कुचैले, तन पे लिपटे, चीथडों को घिसते, वो मजदूर

कभी औधे तो कभी हमारी चाहतों में हामी भरते

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