हम नाजुक से, और पत्थर से, वो मजदूर
वक़्त की पहेलियों में, निवालों को गिनते, वो मजदूर
मजबूरियों में गुनगुनाते, गम को पसीने से धोते, वो मजदूर
जुमलों की मंडी में हर बार ठगे जाने वाले, वो मजदूर
मैले, कुचैले, तन पे लिपटे, चीथडों को घिसते, वो मजदूर
कभी औधे तो कभी हमारी चाहतों में हामी भरते, वो मजदूर
फिर भी अलग थलग, समाजी बिरादरी वाली चक्की में पिसते,वो मजदूर
जिनकी जरूरतों में रही, महज दो वक़्त की रोटी, कुछ तन पे लिपटे चीथड़े, और झोंपड़ी - ए - मकान
आज जब कुछ सहारा ना मिला, तो कारवां को लिए चल दिए
मगर रौंदे गए,
सुना है कुछ लाख पाए हैं, जब पहुंच गए शमशान.....


