मेरे अंदर दरिया ओट लिए बैठा गया
हट से भरी छाती में क्रोध का विष लिए वोह ढढ़ गया।
खोलता खून की कुछ बूंदे ज्योंत्यो छिटका गया
जला चर्म काया को, कोख ही भभूती कर गया।
कुंठित मनु से बुध विसर , रिसता मस्तिषकाघात छोड़ गया
लिए कोड्ड असमंजस का , तित्तर बित्तर मुझे बिखेर गया।
बोझ वक्ष पे भरे अश्रुदानो का ,निज नभ को विभोर गया।
हल बनजर छाती पे जैसे खुद अडा छोड़ गया।
आधी सदी का हो गया , जो हो गया सो हो गया
यह सोच सोच मैं सालो में सदियां उड़ेल गया ।
भीतर निचुड़ शब्दकोश ,विमर्श की हाला भर गया
अनिच्छा के अर्थ , भाप बन छाती भर सांस घोट गया ।
बोझ नींद का ,पलको को भारी कर गया
अर्धनग्न स्वप्न अर्धसत्य बन जीवनी मेरी ड्स गया ।
उफ्फ हुचक्ता मनस्ताप भाप बन प्रोढ की नजर धुंधला गया
सागर का उफान ,ओट पलट विष मंथन को उड़ाल गया।
आशीष गौड़
१२ मई २०२०


