
मेरे अंदर दरिया ओट लिए बैठा गया
हट से भरी छाती में क्रोध का विष लिए वोह ढढ़ गया।
खोलता खून की कुछ बूंदे ज्योंत्यो छिटका गया
जला चर्म काया को, कोख ही भभूती कर गया।
कुंठित मनु से बुध विसर , रिसता मस्तिषकाघात छोड़ गया
लिए कोड्ड असमंजस का , तित्तर बित्तर मुझे बिखेर गया।
बोझ वक्ष पे भरे अश्रुदानो का ,निज नभ को विभोर गया।
हल बनजर छाती पे जैसे खुद अडा छोड़ गया।
आधी सदी का हो गया , जो हो गया सो हो गया
यह सोच सोच मैं सालो
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