रोज़ शाम जिस रास्ते से मेरा जाना होता है , ठीक उसके बगल में है डंकन रोड और उसके पीछे झांकता ऊंचा , तंग, कसमसाया सा, मैला कुचैयला , भीड़ भाड़ भरा ,फटी हरी चादरों से झांकता कमाठीपुरा का मोहल्ला।

कमाठीपुरा के किस्से मशहूर है , हालांकि मैंने पढ़े भी है ।


देखा नहीं कभी लेकिन ।।


शायद ऐसे ही होता होगा वहां का कोठा ।



वही काशी बाई का कोठा।।


ज़रा थर्याया , तनिक भरमाया ,

खाल उधड़ी, बिगड़ी शक्ल का सर्माया।

ऊंघती उबासी लिए, मुंह फाड़े ,फड़फड़ाता उड़ नहीं पाता ,

काशी बाई का वहीं कोठा , ऊबता पर मर नहीं पाता।।


सुनि सड़के , सुबकते चबूतरे

नंगे चिलमन पे खरचत पैनी नज़रें।

 और फटे अब्रारो में पोशीदा उस रात की नज़्में 

काशी बाई का वहीं कोठा , सोता पर जग नहीं पाता।।


पास की गली में जलती धूप की ओट

गली के आंचल में बिछी बकरी की मनिंद,।

 और उसकी खाल से बनी चारपाई की महक

काशी बाई का वहीं कोठा, मरे जिस्मो का बेनाम खाता।।


गलीचे पे उल्टे पांव के धब्बे, बीती रात के कसीदे

मुंढेरो पे सूखे थूक में गूथे कत्थे के धब्बे ।

सुलगते चूल्हे पे ठंडे पड़े ख्वाब 

वहीं काशी बाई का कोठा , चीखती तवायफ मदहोश पाशा।।


बे माने से पड़ोसी , उखड़े से रिश्ते 

ख़ामोश तंग सिरहाने पे ख़तम होती वोह वजह।

मैली कुचैली चादर पे मर्दानगी के धब्बे

काशी बाई का वहीं कोठा , मन्द रोशनी के काले कसीदे।।


बगल में सरोता, चबाई थूकी हुई चाली

लटके पायजामा में उल्टी लटकी शर्म।

ज़ख्मी सलवट भरी खूनी चादर पर

वहीं काशी बाई का कोठा,नंगी आंखों की बेहूदगी भरा भ्रम।।


शहर के किसी कोने में , किसी विराने लगते मोहोल्ले में

बेजुबान लाशों का मलबा , जो बोलता , चलता रहता हैं।

किसी अपने को ढूंढ़ता फिरता हर किसी बाजू में 

काशी बाई का वहीं कोठा, जहां हुनर का बिस्तर हर रात सजता रहता है ।।


कोयले से काली आंखो , और उसको ढकते अब्रू

हुकार लेता पेट और उसपे कमर की पेशानी।

मरघट सी सुनि हसी और बन्द पड़े सडे एहसास

काशी बाई का वहीं कोठा , उखड़ी पपड़ी पे चिपटी बामनी।।


बाएकले के लाल अहाते में, उस झुकते ढेहते दरीबे में

रहती उसकी लाश थी , जो दिखती उसकी पर हमशक्ल थी ।

बस्ती से वोह आई थी , या फिर वही से बेची गई थी।

काशी बाई का कोठा , चीख जहां ठंडी जमही थी।।


रंग बिरंगी गुड़िया से खेलने की उम्र जो थी

और उसमे वोह खुद खेली उछाली गई थी ।

काली पिली जांघे लिए , वोह खूब उधेड़ी गई थी।

नोचे हुए तन के उसके हर उस टुकड़े का घाव झेलता 

काशी बाई का वहीं कोठा।।


दरिंदी रात में सनी वोह चीख,और नंगी आंखों से रिसते खून के वोह धब्बे 

रूह छोड़ दौड़ रहे वोह शर्मिंदा मास के लोथड़े ।

बन रहे हर रात का कोई सौदा, काशी बाई का वहीं कोठा।।


मौत सिरहाने रख , सोती है वोह उंगलियों में इज्जत लपेटे 

गीले सने हाथो से होती है जब वो रुसवा रोज़ शाम सवेरे।

कुछ दाग जो पलते है कोख में बनके नाजायज रिश्ते

भूख हवस एक दायरे में रखता ,काशी बाई का नाजायज कोठा ।।

   

आज बंद कई किवाड़ उसके , जब्त कई सांस जिसकी

लिए खड़ा है कंकाल खुदका 

शर्म से झुका ,काशी बाई का वहीं कोठा ।।


आशीष गौड़ ।

२९ अप्रैल २०२०