फितरत फाँस फ़रेब 

आईनें में परछाईयाँ जो नज़र आती हैं, ज़िन्दगी

बाहर न जाने इससे अलग क्यूँ नज़र आती हैं |



ख़ाक और आँसू की तामीर बनी जो ज़िन्दगी

मैने उसमें मौत की जगमगाहट को बहते देखा |


ये फरेबी हसी ये बेहिस सुलूक ,ये हूनर

चेहरे की जालसाजी का तुझे कहाँ से आयी |