परिभाषा
मिलने की मुझसे इतनी ज़िद्द न करो, कहीं
मिलने पर तुम्हें कोई अफ़सोस न रह जाये |
जब खुद को ग़मगीन करना चाहता हूँ ,तब खुद को अपनी
बाँहों से छुड़ा कर यादों की उंगली पकड़े चलने लगता हूँ |
ये आशिकी भी क्या शह है ,इसमें हर वक़्त आग
जलती रहती है ज़िन्दगी ख़ाक होने के लिए |


