पराये ख़्वाब 


वीरान निगाहें सुनसान राहें ,मुझ से मेरा हाथ 

पकड़कर पूछे ज़िन्दगी बता तुझे किधर जाना है | 


काफ़िला कोई नहीं गुज़रा इस रहगुज़र से कई अरसे से 

फिर तू किसका रस्ता देखे यूँ टकटकी लगाये | 


लगता मेरे ख़्वाबों को कोई मिल गया अपना 

मुझसे कह कर गया अभी वापिस लौट कर आता हूँ | 


तसव्वुर में तो थी तू मेरी , ठंडी आहों से पता नहीं कब निकल गयी 

धुएँ से जो तस्वीर बनायी थी आसमाँ में पता नहीं कब हवा में घुल गयी |


मेरी ज़िन्दगी हसरतों का जंगल है , मुझे मुँह  

छुपाकर इस जंगल में जीने का मौका मिल गया |