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निग़ाह


निग़ाह

जब भी तुझे गौर से देखूँ हर मर्तबा कुछ अलग सी लगे , लगता खुदाने नेमत बख़्शी है मेरी निग़ाहों को हर ज़ाविए से मोहब्बत को पढ़ने की |

— आशीष
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