नखरें


मेरे दिल को ऐसा क्या पड़ा अश्क़ों का चस्का ,की

आंखों को मोतियों की माला पिरोने की आदत पड़ गयी | 



जाकर खुली मेरी आंखें उस दरवाज़े पर ,जहां से

ज़िन्दगी को कई बार मुँह छिपाये गुज़रते देखा | 


अब दिल को बोझ लेकर चलने की आदत पड़ गयी है, वो अपना 

चेहरा छिपाये गली से गुज़र जाता है की कोई उसका हाल न पूछ ले | 


इस रह-गुज़र में अपना कोई नहीं है,लगता

 मेरे चाहने वालों की कमी है इस शहर में | 


जो दिल डूबा मैं कैसे किनारे रह गया  

लगता मैं होश गवां कर ज़िन्दगी जीता रहा |

 

मैने मुक़म्मल जहाँ की तलाश में दिल की नहीं सुनी 

और फ़ाख़्ता उड़ाकर उनसे अपना घर पूछता रहा | 

 

जाओ पूछ आओ मेरा घर का पता ज़माने

से ,यहाँ मुझे जानने वाला कोई नहीं है | 


मुकर गया मुझे पहचानने से मेरा नाम पता पूछकर 

मेरा चेहेरा लगाये बहोत से लोग घूमते हैं इस शहर में | 


मुझे छोड़ा भी नहीं अपनाया भी नहीं , पराया हो गया  

पड़ोस के दीवार से झुके पेड़ की छांव बनकर |  


जिस बे-सब्री से तूने मेरे हाथों को छुआ ,उस दिन

से रातों को नीन्द में चलने की आदत पड़ गयी मुझे  


रात उतरी है मेरी आंखों में एक उम्मीद लिये 

ज़रुर तेरी परछाई गिरी होगी मेरे घर के मुंडेर पर |








 




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