खुन्नस इतनी हो गयी है मुझे ज़िन्दगी से,लगे

चाँदनी से कहीं अपना घर जला न डालूँ मैं |


संग-फ़रोशों के शहर में पत्थर का चेहेरा ले के न घूम,कहीं

कोई संग-तराश तुझे इन्सान से पत्थर की मूरत न बना देे |


जब ढूँढने निकला अपने ज़ख्मों को हर गली कूचे शहर गांव में

देखा हर गली चौराहे पर निकला मुझ अकेले के इन्तिज़ार में |