दिल्ल्गी
ज़िन्दगी को यूँ बदनाम करना कोई अच्छी बात नहीं ,पैमाना गर
छलक जाये होंठों तक आते-आते इसमें साक़ी का कुसूर नहीं |
हैराँ हूँ मैं ज़िन्दगी इस क़दर शरीफ़ होकर पेश आयी कैसे
की इसने इतनी सारी खुशियां दीं और रुलाया नहीं |
तुझे पाना मेरा मक़सद नहीं था , ये तो
मैं यूँ ही दिल्ल्गी कर रहा था ज़माने से |
ढूँढ सको तो ढूँढ लो मुझे , मैं काफ़िर इतना
बदनाम भी नहीं की इतनी आसानी से ढूँढा जाऊँगा |
ये मन्ज़र ज़िन्दगी के छत से अच्छी नज़र आती है
बादलों की ओट लिये ये कभी धुंधली नज़र आती है |
धूप के चश्में से देखो ये ठण्डी छांव सी लगती है
नंगी आंखों से देखो तो ये आँखे चुंधयाती है |
ये मन्ज़र कच्ची धूप सी मीठी लगती है
पर पता नहीं पलक झपकते कहीं गुम हो जाती है |
हर दर्द जो मिले ज़िन्दगी से खुद की दवा लगती है
हर बहाना ज़िन्दगी का यहाँ से सच नज़र आती है |
हर आदमी ज़िन्दगी के छत से कठपुतली लगता है
नाचता है किसी और डोर से पर खुद को शहंशा समझता है |
