बहरुपिया


कूचे से कदम जो निकले मेरे

हर किसी ने ओढ़ा तेरा चेहेरा हो जैसे |



जो अन्धेरा भी नज़र आया मुझे

लगा चाँद ने लिबास बदला हो जैसे |


हया जितनी छिपायी मैने जिस तरह से

ज़माना हर ज़ाविये से देखे मेरे जिस्म को जैसे |



मैं दिखूँ हूबहू जो दिखूँ मैं तस्वीर में

ज़ाविये को बदल दूँ तो खुद हो जाऊँ अजनबी जैसे |



मैने तूफ़ा में चिराग़ जला कर उजाला कर दिया

चिराग़ का लिबास पहने कोई चिंगारी सुलगा गया हो जैसे ||