अपना मकान


ये ज़रुरी नहीं हर किसी को घर मिले ढूँढने पर 

यहाँ तो हर मकाँ से लोग गर्दन निकालकर मुझे देखते हैं 

पता तो जेब में है मेरे 

पर उधर से कोई और निकलता है 

अपनी गली में मैं बेगाना लगता हूँ 

जब पहुँचा हूँ अपने घर की ड्योढ़ी पर 

लोग मेरे घर को किसी और का बताते हैं | 


मेरे घर के दरवाज़े पर 

धुंधला सा मिटा नाम अब भी थोड़ा दीखता है 

जिस पर अभी किसी और का नाम चढ़ा दीखता है 

सूखे कीचड़ से सने पत्थर के नीचे 

मिटे हर्फ़ों में लिखा 

फटा अधूरा ख़त 

अभी भी दबा पड़ा दीखता है | 


बड़ी मुश्किल है 

अपने घर को अपना कहना 

अब ये शहर मुझे बेगाना लगता है 

जिसके रह-गुज़र में मैं बैठा हूँ 

उस शहर में मेरा घर कैसे हो सकता है 

मैं तो खुद से ही सिर्फ नाराज़ हो सकता हूँ 

यहाँ तो पूरा शहर ही मुझे बेगाना समझता है |