पिंजरा
जब देती है जन्म एक मां , पिंजरे में !
अनजान इस सच से कि यह जन्म नहीं मृत्यु है उस नन्हीं जान की ...
पंखों का होना ,होकर भी ना उड़ पाना ,क्या दर्द होता है इसका जानती है वह मां ...
बेवस अपनी किस्मत से सिखाती है पंख खोलना उस नन्ही जान को भी
पर नहीं खोल पाती उस पिंजरे का ताला
जिसे बना चुकी है वह आकाश ,उस नन्ही जान का
पूछता है वह , मां ! हम क्यों नहीं उड़ सकते उस नीले आसमान में
बेबसी आंखों से पानी बनकर बाहर आती है उस मां की, कहते हुए -
हम भी गुजरेंगे एक दिन होकर उस नीले आसमान से
लेकिन....
शायद यह शरीर पिंजरे में ही कैद रह जाएगा !
- # आशीष नामदेव


