जिस्का विशाल विस्तार हो
हर चेहरे को अलग पहचान हो
जीवन जिस्की होंड से
मेरीयमान हो
जिस बिन बंजर बीया-बान हो
उन निगाहो पर गोष्ठी आज करेंगे.....
मृग नयनी लगे कभी
कभी झील सी निर्मल हो
कभी गहरी सागर सी
और कभी नशीला जाम हो
वर्णन में जिसके शब्द पड़ जाए कम हो
उन निगाहो पर गोष्ठी आज करेंगे......
हर मूरत का जो ताज हो
छिपाए अनेको राज हो
कभी चुप चाप सी
कभी कोलाहल मचाती शाम हो
जो उत्तर अनेको प्रश्नों का
उन निगाहो पर गोष्ठी आज करेंगे.....
हर वन उपवन तेरे संग
तू नहीं तो फिके रंग
ये नदीयां, नाले, पर्वत, मोर
खिचे मुझे सब अपनी और
जो मदाह ईन मोहक दृश्यो का
उन निगाहो पर गोष्ठी आज करेंगे......