बादल तो आये घिर के, बरसात न हुई। 

लगता है फिर जमीं से, कुछ बात न हुई।।


रूठने-मनाने का क्रम, अभी भी जारी है। 

न उदासी जीती है, न ही उम्मीद हारी है।।


मजबूरियाँ उन दोनों की, उन पर अभी भारी हैं ।

दूरियाँ हैं काफी पर,मजबूत उनकी यारी है। ।


जमीं का दर्द भी, उर से बाहर आया है।

नदी, तालाब, झरने, सागर भी भर

आया है।।


विरह का ताप,जल को ऊपर तक लाया है।

तब 'धरा' को 'बूँदों' से, 'बादल' ने पाया है।।

                ✍आशीष