'पिताजी' को समर्पित -


उँगली थमा के अपनी, 

हमें चलना सिखा दिये।

कन्धों पे खुदके बिठा के, 

हमें दुनियाँ दिखा दिये ।।


मेरी तरक्की के लिए दिये ,

हर चौखट पे जलाते रहे।

मैं बार-बार हारता रहा ,

वो हर बार हौसला बढ़ाते रहे।।


वो इस खुशी के लिये ,

कितना कुछ सहते रहे।। 

मेरे 'कुछ बनने' की आश में ,

दर्द को भी खुशी कहते रहे।।


मेरी इच्छायें पूरी करते, 

वो झुकते ही चले गये।

हमें तब समझ में आया, 

जब हम 'पिता' कहे गये।।


अब जाकर समझा है, 

कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं।

काँटे छुपा लेते हैं खुद में, 

फूल बच्चों के लिये संजोते हैं।। 

       ✍आशीष