कुछ पंक्तियाँ माँ गंगा पर सादर-
इसके तट जयकार गूँजता ,
हर - हर गंगे माता।
श्वेत - श्याम कण यही बताते ,
सुख-दुःख आता जाता ।।
इसके तट करताल बजाकर ,
मुक्त कण्ठ से गाते।
रेती बिस्तर ,ओढ़ चाँदनी,
प्रभु में ध्यान लगाते।।
कल्पवास कर तन मन कसते,
साधू, जन ,सन्यासी।
मुक्ति की धारा अविरत है,
हो बिठूर या काशी ।।
इसके तट हैं दोनों लगते,
मेले सुख और दुःख के।
कोई मिल उसमे तर जाये,
कोई पावन जल भरके,


