चाँदये चाँद जो रात-रात,भर जगता है।इतनी ऊँचाई पर है,पर धरा को लखता है।।होकर मायूस अश्रु,ओस के बरसाता है।एक मैं हूँ जो तन्हा हूँ,एक वो है जहाँजीवन पलता है।।
चाँदये चाँद जो रात-रात,भर जगता है।इतनी ऊँचाई पर है,पर धरा को लखता है।।
होकर मायूस अश्रु,ओस के बरसाता है।एक मैं हूँ जो तन्हा हूँ,एक वो है जहाँजीवन पलता है।।