चाँद

ये चाँद जो रात-रात, 

भर जगता है।

इतनी ऊँचाई पर है,

पर धरा को लखता है।।


होकर मायूस अश्रु,

ओस के बरसाता है।

एक मैं हूँ जो तन्हा हूँ, 

एक वो है जहाँ

जीवन पलता है।।

     ✍आशीष