सावन की बूदां-बांदी मे, जज्बात रफ्तार से उफन आऐ । मुस्कूराहट की रिम -झिमाहटे, मुझे नदी की तरह अविरल बनाऐ । क्या मोड दिया है समय की चट्टानो ने के ये जल बस खींचा चला जाऐ, भूलकर खुद को ही , चाहता है खुद ही मे मिल जाऐ। थम जा ऐ जल , थोडा ठहर -ठहर कर चल। शायद ये अदांज उन्हे पंसद ना आऐ कही रूठ ना जाऐ सागर इस नदिया से जब तु किनारे जल्दबाजी मे पहुँच जाऐ।