मैं सोचता था कि,
मैं लम्बी यात्राओं के लिए नहीं बना हूँ,
मैं उस धूल के,
एक तिनके के समान हूँ,
जो कभी अपने वश में नहीं रहता है,
बदलती हवा के रूख के हिसाब से,
स्वयं को ढाल लेना,
मैंने हवा के विपरित जाने की,
कभी कोई चेष्टा नहीं की,
इस प्रकार से,
मैंने कभी कुछ अच्छा भी नहीं लिखा,
बस, समय के थपेडों की वजह से,
जन्मीं उस पीड़ा का,
कुछ अंश अपने को समझाता रह गया,
मुझमें और उस भिखारी में,
ज़रा-सा भी फर्क नहीं है,
वो अपने प्रतिरूप के अनुसार,
भीख माँग पेट को भर लेता है,
मैं भी,इस हिंदी से थोड़े शब्द जुटा,
अपने हृदय को भर लेता हूँ,
एक छोटे से बच्चे की तरह,
मैं भी कल्पनाओं का आदी हूँ,
चहचहाती चिड़ियों से बातें करना,
या ओस की चढ़ती परत पर,
खुद को सुकून से लेटे हुए देखना,
मेरे अंदर अभी खत्म नहीं हुआ है ।।
मुझे मात्राओं के बारे में,
बहुत अल्प सा ज्ञान है,
मैं बस इस साहित्य को,
टूटते हुए नहीं देखना चाहता,
ये माँग करता है कि,
अपना पूरा दमखम लगा,
मैं कहीं इसे अपनी वेदना से जोड़ दूँ,
इसी प्रयास में मैं,
रोज़ जीने-मरने की जंग करता हूँ,
हर नये सवेरे,
एक अंतिम प्रयास की भाँति,
मैं रोज़ वहीं लौटकर आ जाता हूँ,
जहाँ से मैंने प्रारम्भ किया था,
अंतिम साँस की प्रतीक्षा करते-करते,
मैं रोज़ अंतिम साँस से मिल आता हूँ,
हर रोज़ नये झूठ की तरह,
मैं रोज़ मर के,
रोज़ जीवित हो उठता हूँ। ।
- ©आryant


