आज भी हम सो गए, तुम सिरहाने बैठे रहे रात भर मेरे।
कब जुनूं शांत पड़ गया मेरा पता ही न चला।
कब मुझे मोहब्बत ने अपने दामन से जुदा किया पता ही न चला।
अश्क मेरे बेबाक निकलते थे अगर तुम इक दिन भी न दिखते थे, कब दिल को धीरे धीरे जुदाई की आदत हो गई पता न चला।
अक्सर कहते थे मुझसे मेरे चाहने वाले साथ उतना ही हैं जब तक रास्ते में मोड़ नहीं।
हम नादान मोड़ो को कमजोर समझने की जहमत कर बैठे।
फिर इक मोड़ आया बहुत ही ताकतवर था, जुदा कर गया।
हर इक सपना, मेरी डायरी के हर एक पन्ने को दो हिस्से में बांट गया।
क्या लिखा था न तो पढ़ने में आता है न ही ये समझ आ रहा है कि क्या सोच कर लिखा होगा मैंने।
अरे हां सोचता कौन हैं मोहब्बत में?
मैंने तो कभी नहीं सोचा होगा।
याद आया कहीं इस पन्ने में साथ जीने मरने की कसमें तो नहीं थी।
हद है इक बार फिर से लिखने की आदत डाल ली है मैंने।
अब इसमें खयाली पुलाव नहीं पकाता मैं।
आंखें खोल देने वाली बातें और दिल को छल्ली कर देने वाले किस्से लिखता हूं।
जिससे हर इक पागल को ये अच्छे से समझ आ जाए कि, जिंदगी जीने का नाम हैं जिसमें मोहब्बत के पल उसको उसके शीर्ष पे जीने के पल हैं, कसमें, वादे और कसीदों के नहीं।
क्युकी जो वादा टूटे न उसका जादा नाम कम ही देखा गया हैं।
हां अगर टूट जाए और जिससे मोहब्बत की थी वो इसी वादें को पूरी दुनिया के सामने खोल के दहाड़े मारे तो बहुत नाम होता है।
हां हैं अगर मोहब्बत तो जी लो, बिना वादे के साथ क्युकी ज़िन्दगी में भरपूर इक ही काम हो पाता है या तो जीना या मोहब्बत।
मैं जहां तक आपको ले जाना चाहता था और अगर आप सोचते हैं आप पहुंच गए तो आप खुशनसीब है कि आप वो रस ले चुके हैं, अगर ये बातें मिथ्या य दब्बू लग रही हैं तो मैं आपसे ३ साल बाद ज़रूर मिलना चाहूंगा।
