मेरी ख़ामोशी मेरे कानो में कुछ बुदबुदा गई है,
मेरे मासूक ने जो न समझा वो समझा गई है।
वो होते हैं बर्बाद मुझको जेहन में लाकर के,
कोई बताए की ये मुसीबत क्यों हो गई है।
आए थे बता गए हैं रकीब के मदहोश किस्से,
ये क्या हुआ कि जिन्दगी अब हसीन हो गई है।
न जाने क्यों सबब पूछते हैं मेरी तन्हाई का,
ये बात और की हमें अब मोहब्बत हो गई है।
बिना देखे पश - मंजर आशिक़ का लोग,
क्यू कहते हैं मोहब्बत लाइलाज हो गई है।
मेरे जिन्दगी में नुख्श निकालने वाले लोग,
तुमसे मिलकर ज़िन्दगी जिन्दगी हो गई है।
तन्हाई से जो डरे वो नापाक आशिक़ हैं,
' असरार ' ऐसे ही रहने की तलब हो गई है।
आर्यन त्रिपाठी।

