आसान है क्या ?

चल पड़ना तूफानों से भिड़ना

टूटी डगमगाती नाव लिए

जिसका लहरो से कोई नाता नही

जब तुम्हारा सारथी ही

तुम्हे कूदने पे मजबूर करने लगे

तुम्हे तैरना आता हैं

पर बात अब जान बचाने की हो

तुम हाथ पैर मारो

पर कहीं चलते न दिखो

तब जो सन्नाटा तुम्हे सुनाई देगा ना

तब जो अंधेरा तुम्हे दिखाई देगा ना

तब पूछना अपने आप से ,

आसान है क्या ?


भरी दोपहर में बदन पे

बीते हुए कल के जख्म लिए

नंगे पांव चलना

जब उन्न ज़ख्मों से दर्द और आसूं

पस बनकर बहने लगे

हर कदम मौत के बराबर हो

और रुक जाना उससे भी बदतर

भूक और प्यास लगे

पर मुह खुले सिर्फ दर्द की आह में

जब उन्न सारे जख्मों पर

कीड़े भिनभिनाने लगे

मौत का परिंदा

तुम्हारे सर पे मंडराने लगे

उस लम्हे

उस तिलमिलाहट में

पूछना खुदसे

आसान है क्या ?


अपनो के भेस में आये राक्षस

आपको अपना बनाने की हरकत करे

अपनों के मुहखुते से उनकी पहचान चुप जाए

उनके दिए तौफो से खून की महक आये

पर उन्हें ठुकराने पे

अपनो की जान के लाले पड़ जाए

उन दरिंदो को अपनाने से ,

खुद की जाए

और भरिष्कर करने पर

अपनों की जान जाए

तब उस उलझन में

पूछना खुदसे

अपने आप से

आसान है क्या ?