यूं तो बयां कर दूं,
अपनी रूठी हुई रातों की दास्तां,
पर आप ना समझ पाएंगे,मेरी उजली रातों की बातों को,
अगर समझ सकते तो आसमान यूं काले रौशनी में चांद की चक्माते हुई रौशनी फैले होते,।।।।
रातों की बाते, रात में ही सिमट कर बैठ जाती है,
समझा कर अपने आप को ही बहलाना पढ़ता है,
हम ख़ुद से खुद का निजाम का फ़ैसला करने की आदत हो गई हैं,
जमाने की तौर तरीके से अपनी बात कह दी जाते है ,
यह अधूरी कहानी बेश्क आपको अधूरी ही है!??
