ये शामें रोज़ यूँ ही ढलती हैं बेफिक्र-बेपरवाह.... इन्होनें कभी ये नहीं सोचा के; कितनी उम्मीदें इनके ढलने पर बंधी होती हैं कितने इंतज़ार-कितने वादे इन पर रुके होते हैं ये बस ढल जाती हैं,मुट्ठी में रखी रेत सी ..फिसल जाती हैं   मानो इनको और कुछ ना आता हो सिवा ढल जाने के; जैसे सदियों तक तप करके माँगा हो इन्होनें अपने लिए, यूँ ही ढल जाना किसी लोहार की भट्ठी से निकले पिघले लोहे की मानिंद बह जाना ताकि शाम की लालिमा,रात्रि की कालिमा में बदल सके ताकि,वक़्त के घोड़ों के समानांतर दौड़ते वादों को थोड़ा और इंतज़ार करना पड़े प्रियतमों के इंतज़ार में बैठी प्रेयसियों के इंतज़ार की घड़ियां ; और लम्बी हो जाएँ....इतनी लम्बी की; अपनी साँसे भी उनको आहटें लगने लगें   तुमने क्या सीखा इनसे ? ये समझना मेरे बस में नहीं...!! जैसे मैं तुमसे हमेशा कहता हूँ,के मैं तुम्हें समझ नहीं पाता तुम भी इन शामों सी हो.... जब चाहती हो ढल जाती हो बिना किसी फ़िक्र के !!!   चलो फिर मिलेंगे शायद तब,जब शामें ढलना भूल जाएँ और; मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकूं क्या कहा ....???!!! अभी क्यों नहीं पकड़ सकता हाथ...!!! क्योंकि अभी तो तुम शाम हो ना, और ; शाम का हाथ कौन पकड़ सका है ..