इस जहान में पहली बार प्यार का एहसास कराया था।
माँ आपने ही जीवनदायनी दुग्धामृत पिलाया था।।
नींद के आग़ोश में जब सारी क़ायनात हो जाती थीं।
मेरी एक रुदन से माँ आप, झट से जाग जाती थीं।।
जेठ की दुपहरी में, धूल से में, हीरा से कोयला हुआ करता था।
माँ आप नहलाती थीं, खिलाती थीं, सुकून से आँचल की शोहबत में सुलाती थीं।।
आपके पल्लू से मिले एक रुपये से, मैं सारी खुशियां खरीदता था।
आज पैसे बहुत हैं, पर वो खुशियां नहीं माँ, आँचल की छाव में जो पाता था।।
ख़ुदा मेरी एक दुआ क़बूल कर दें।
माँ के गोद मे खेलूं, ओ लम्हा बख्श दें।।


