शहर एक से दूजे जाता रहा।
ख्वाबों की ख़ातिर ख़ुद तो तपाता रहा।
गाँव दूर हुआ, अपने छुटते गये....
शहर तेरी चकाचौंध पे ख़ामोखा इतराता रहा।।
मौसम का हर रंग देखा गाँव मे,
कोयल की कुक, फागुन की फ़ाग देखा गांव में,
पीपल की छाव में सोता रहा,वसंती राग में खोता रहा...
उन्मुक्त था, स्वछंद था, प्रकृति की गोद गाँव में।
शहर तू उतना भी बुरा नही, मजबूरियां तेरी भी है,
सपनें लाखों लेकर आते है, पर सरहदों में सीमित तू भी है,
राजा से रंक, रंक से राजा बनाता रहा तू...
वफ़ा तेरी ही हैं, बेवफा तू ही है।।