नैनों से निमंत्रित की थीं तुझें, मन के मकान में।
क़बूल करकें तू आयी होतीं, मेरे जहान में।।
मजबूरियाँ देख मेरी तुमनें, इरादा बदला था।
तेरे स्वागत में अखियाँ थीं, तेरे सजदे में ये सर था।।
तेरे मुखड़े की चमक अब तो, मलिन हो गयीं।
जल बिन देख, कैसे मछली, प्राणहीन हो गयीं।।
तेरे जाली मोहब्बत का अब, मैं जिक्र नही करता।
फ़क़ीर हूँ मैं आशियाँ की अब, फ़िक्र नहीं करता।।