नींद बहुत कम आती है अब, रात में...
तुम भी तो बहुत कम आती हो, मुलाक़ात में...
एक मुरझाईं फ़ोटो की तरह, एनकों पर मानो चिपक गया हो..
गुज़रा मंज़र, कुछ धुँधलाया सा, ख़यालात में..
तेरी आवाज़ भी तो अब सुनाई नहीं देती...
मगर तू कहीं छुपी बैठी है हर बात में..
किसी रोज़ आओ, तो बरगद के उस पेड़ से मिल आना..
दफ़नाए थे जहाँ तुझे लिखे ख़त, जज़्बात में..
शायद हवा चलने पर धुआँ उठता है वहाँ..
पता सा कुछ चला है पूछताछ में..
काश समंदरों में विदा किए होते वो सुर्ख़ पुर्ज़े..
पिघल-डूब जाते मोज़े-दरिया, उस रोज़ बरसात में..
नींद बहुत कम आती है अब, रात में..
तुम भी तो बहुत कम आती हो, मुलाक़ात में..
- अरविन्द यादव


