हा, हम विद्रोही है

किन्तु हम भी थे शांत, सरल, सलिल जैसे बिना अवरोध के जल।

हो गया है तीव्र, नमकीन, कठोर जैसे बिना लपटों के अनल।


मत करो मजबूर उसे जो छूट गया है कहीं,

है धधकती आग भी जल रही है कहीं।

जब टूटे खामोशियों का सब्र,

जब हुताशन का हो आगमन,

जब अधीर का हो जाए समन,

तब तब जन्म लेता है विद्रोही मन


अरविन्द 'अपराजित '