वह पन्ना अब भी मेज़ पर लेटा है,
जैसे कोई अधूरी हसरत इंतज़ार में हो।
दवात की तली में जमी है गर्द,
जैसे कोई पुरानी याद कैद में हो।
उसने लिखना छोड़ दिया है।
अब शब्द उसके होंठों पर ही दम तोड़ देते हैं,
वो जिन्हें कागज़ पर उतरकर अमर होना था।
खामोशी ने ओढ़ ली है उसकी उंगलियों की पोरें,
शायद अब उसे जीने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं,
या शायद...
उसने ख़ुद को ही पढ़ना छोड़ दिया है।
