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नियति का कर्म

जब आँख खुली तो भाग्य लिखा,

अंधियारे में फिर कर्म दिखा।

नियति ने भी करवट ली,

जब कर्म से भाग्य जगा।

नियति का खेल अजीब बड़ा,

कभी सुख की डाली, कभी दुःख का घड़ा।

कर्म की धुन जब छेड़ी,

नियति भी आगे न अड़ी।

माना भाग्य से मिलता

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