कोमल है वो पंखुड़ी सी, छू लो तो बिखर न जाए,
सपनों की वो रेशमी डोरी, जो दिल के पास सदा आए।
चाँदनी रातों में जैसे, इक मीठी सी बात हो,
शब्दों में हो सौंधी ख़ुशबू, और आँखों में बरसात हो।
सुनती है सबकी चुपचाप, पर कहती कुछ नहीं,
दर्द भी मुस्कुरा के सह ले, जैसे कोई कहानी हो कहीं।
हवा के साथ बहती नहीं, पर उसमें भी संगीत है,
कोमल है वो, कमज़ोर नहीं—उसकी ख़ामोशी में भी जीत है।
हर रिश्ता उसमें ढल जाता है, जैसे रंगों में रौशनी,
कोमल—सिर्फ़ नाम नहीं, ये तो है एहसास की गहराई कहीं।
'अपराजित नंदी '


