हाल-ए-दिल है हमारा शीशे की तरह
टूटने को भी आदत से मजबूर है
हाँ खुशी की तलब में तरसता है दिल
पर चाहत का तड़पना ही दस्तूर है

मान लो जो वो है आँसूओं की नमी
की कोशिश रोकने की वो अंजाम है
जान के भी जो अनजान थे हम बने
है मचा तब ही सीने मे तूफान है

इन गुजरते पलों में है कितना ज़हर 
कबसे हमको मिटाने को बेताब है
इतना नाजुक अगर है खुशी का वहम
आँखों में फिर क्यों वो हसीं ख्वाब है

थामे रखते थे हम सारे गम होंट से
बांध टूटा तो सैलाब सा बह गया
ऐसा एक कर दिया शायरी ने सितम
जो छिपाना था वो हाल-ए-दिल कह दिया